झाबुआ में भगोरिया की धूम: ढोल-मांदल की थाप और चांदी के गहनों की खनक से गुंजायमान हुआ आदिवासी अंचल
झाबुआ। मालवा-निमाड़ की माटी में जब ढोल की थाप और मांदल की गूंज सुनाई देने लगे, तो समझ लीजिए कि आदिम संस्कृति के सबसे बड़े उत्सव 'भगोरिया' का आगमन हो चुका है। झाबुआ जिले में इस वर्ष भगोरिया पर्व अपने पूरे शबाब पर है। रविवार को झाबुआ शहर सहित आसपास के हाट-बाजारों में जनसैलाब उमड़ पड़ा। क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या जवान—हर कोई अपनी पारंपरिक वेशभूषा में सज्ज होकर इस लोक उत्सव का गवाह बनने पहुंचा।
परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम
इस वर्ष के भगोरिया में एक खास बात यह देखने को मिली कि यहां परंपरा के साथ-साथ आधुनिकता का भी सुंदर मेल नजर आया। जहां एक ओर बुजुर्ग अपनी पुरानी मर्यादाओं को समेटे हुए थे, वहीं युवा पीढ़ी मोबाइल और सेल्फी स्टिक के साथ भगोरिया के रंग को सोशल मीडिया पर बिखेरती नजर आई। शहर की गलियों से लेकर हाट मैदान तक, हर तरफ केसरिया और बहुरंगी पगड़ियों का समंदर नजर आ रहा था।
चांदी के गहनों और पारंपरिक वेशभूषा का आकर्षण
भगोरिया की सबसे बड़ी पहचान यहां की महिलाओं और पुरुषों द्वारा पहने जाने वाले गहने हैं। इस बार भी हाट में आदिवासी युवतियां और महिलाएं किलो भर वजनी चांदी के हंसली, हार, कड़े और झुमके पहने हुए दिखाई दीं। उनकी पारंपरिक 'घाघरा-चोली' और सिर पर ओढ़ी गई रंगीन चूनर ने उत्सव की शोभा बढ़ा दी। पुरुषों में भी पारंपरिक मिरजई, धोती और सिर पर खास शैली की पगड़ी (साफा) का क्रेज कम नहीं हुआ है। हाथों में चांदी की मुद्रिकाएं और गले में मांदल लटकाए युवक अपनी संस्कृति पर गर्व करते नजर आए।
झूलों का संसार और मनोरंजन की मस्ती
मेले के मैदान में इस बार कई प्रकार के झूले मुख्य आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। आसमान को छूते हुए 'जायंट व्हील' (बड़े झूले) से लेकर बच्चों के लिए 'ब्रेक डांस' और 'कोलंबस' झूलों पर लंबी कतारें देखी गईं। मेलार्थियों ने ऊंचाई से झाबुआ शहर के विहंगम दृश्य का आनंद लिया। झूलों के पास ही लगे खिलौनों और गृहस्थी के सामान की दुकानों पर भी भारी भीड़ उमड़ी।
स्वाद का तड़का: शादी, छोले और पारंपरिक व्यंजन
भगोरिया सिर्फ नाच-गाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह जायके का भी उत्सव है। मेले में गरमा-गरम छोले-भटूरे, समोसे और जलेबियों की खुशबू हर किसी को अपनी ओर खींच रही थी। स्थानीय 'शादी' (मिठाई) और हाट की विशेष पान की दुकानों पर युवाओं की टोली जमी रही। भगोरिया में पान खिलाने की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है, जो प्रेम और सद्भाव का प्रतीक मानी जाती है।
ढोल-मांदल पर थिरकते कदम
दोपहर होते-होते जब ढोल और मांदल की थाप तेज हुई, तो पूरा माहौल थिरकने लगा। अलग-अलग गांवों से आए गेर (नृत्य दल) ने अपनी प्रस्तुतियों से सबका मन मोह लिया। ढोल की थाप पर आदिवासी समाज के युवा हाथ में तीर-कमान और डंडे लेकर थिरकते हुए अपनी वीरता और संस्कृति का प्रदर्शन कर रहे थे। 'मांदल' की वह गंभीर आवाज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी, जो लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का संदेश दे रही थी।
हजारों की संख्या में उमड़ी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस विभाग पूरी तरह मुस्तैद रहा। हर प्रमुख चौराहे पर सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन के जरिए निगरानी रखी जा रही है ताकि उत्सव में कोई खलल न पड़े। प्रशासनिक अधिकारियों ने भी भगोरिया के रंग में रंगते हुए आम जनता के साथ इस पर्व का आनंद लिया।
निष्कर्ष: प्रेम और सद्भाव का संदेश
झाबुआ का भगोरिया केवल एक मेला नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की एकता, प्रेम और उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का दर्पण है। यह पर्व सिखाता है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर ही हम जीवन के सच्चे आनंद को प्राप्त कर सकते हैं। आने वाले दिनों में जिले के अन्य क्षेत्रों में भी भगोरिया का यह उल्लास इसी तरह जारी रहेगा।
ब्यूरो रिपोर्ट: झाबुआ न्यूज़
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