जिला अस्पताल में अव्यवस्था के खिलाफ आम आदमी पार्टी के जिला अध्यक्ष श्री कमलेश सिंगाड़ के अभियान और मरीजों की परेशानियों पर एक विस्तृत लेख प्रस्तुत है।

 
जिला अस्पताल में अव्यवस्था के खिलाफ आम आदमी पार्टी के जिला अध्यक्ष श्री कमलेश सिंगाड़ के अभियान और मरीजों की परेशानियों पर एक विस्तृत लेख प्रस्तुत है।

झाबुआ जिला अस्पताल: अव्यवस्था के खिलाफ कमलेश सिंगाड़ का संघर्ष और मरीजों का दर्द

झाबुआ, मध्य प्रदेश का एक आदिवासी बहुल जिला, जहाँ का जिला अस्पताल सैकड़ों गाँवों और कस्बों के लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख केंद्र है। लेकिन यह अस्पताल लंबे समय से व्यवस्थागत खामियों, संसाधनों की कमी और मरीजों को होने वाली दिक्कतों के कारण सुर्खियों में रहा है। इसी अव्यवस्था के खिलाफ एक सशक्त और मुखर आवाज बनकर उभरे हैं आम आदमी पार्टी के जिला अध्यक्ष श्री कमलेश सिंगाड़। उनका निरंतर अभियान और मरीजों की परेशानियों को उजागर करने का प्रयास अब चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।

मरीजों की वह दयनीय स्थिति जो बनी अभियान की बुनियाद

कमलेश सिंगाड़ का यह अभियान किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं, बल्कि आम जनता, विशेषकर गरीब और आदिवासी मरीजों की सुनी-अनसुनी पीड़ा से जन्मा है। झाबुआ जिला अस्पताल में आए दिन होने वाली समस्याएं एक गंभीर चिंता का विषय हैं:

1. डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी: अस्पताल में चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी देखी गई है। इसके चलते मरीजों को लंबे समय तक इलाज के लिए इंतजार करना पड़ता है। अक्सर, ओपीडी (बाह्य रोगी विभाग) में इतनी भीड़ होती है कि मरीजों को अपनी बारी आने तक घंटों खड़े रहना पड़ता है।

2. दवाइयों की अनुपलब्धता: जिला अस्पताल होने के बावजूद अक्सर जरूरी दवाइयाँ और इंजेक्शन फ़ार्मेसी पर उपलब्ध नहीं होते। मरीजों के परिजनों को निजी मेडिकल स्टोर्स से महंगी दवाइयाँ खरीदनी पड़ती हैं, जो गरीब परिवारों पर एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन जाता है।

3. सफाई और स्वच्छता का अभाव: अस्पताल परिसर और वार्डों में सफाई व्यवस्था अक्सर लापरवाह पाई गई है। गंदगी, मलबा और कीटाणुओं का खतरा मरीजों के स्वास्थ्य को और भी जोखिम में डालता है, खासकर उनके जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही कमजोर होती है।

4. बुनियादी सुविधाओं का अभाव: अस्पताल में बिस्तरों की कमी, टूटे-फूटे पलंग, शौचालयों की दुर्गंध और पीने के साफ पानी की उचित व्यवस्था न होना आम शिकायतें हैं। मरीजों के परिजनों को रहने की उचित जगह नहीं मिल पाती।

5. भ्रष्टाचार और लापरवाही: आरोप हैं कि कुछ कर्मचारी मरीजों से अनौपचारिक रूप से पैसे लेते हैं या उन्हें निजी क्लीनिकों की ओर भेजते हैं। इसके अलावा, कर्मचारियों के रवैये में लापरवाही और उदासीनता मरीजों के आक्रोश का कारण बनती है।

कमलेश सिंगाड़ का अभियान: जमीनी स्तर पर सक्रियता

श्री कमलेश सिंगाड़ ने इन समस्याओं को केवल आवाज़ नहीं दी, बल्कि एक व्यवस्थित अभियान के तहत इन्हें उजागर करने का काम किया। उनकी रणनीति में कई पहलू शामिल हैं:

सोशल मीडिया का प्रभावी इस्तेमाल: सिंगाड़ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, खासकर फेसबुक और एक्स (ट्विटर), को अपना मुख्य हथियार बनाया। वे झाबुआ अस्पताल की वास्तविक तस्वीरें और वीडियो लाइव करते हैं, जिसमें गंदगी, भीड़ और मरीजों की दयनीय हालत स्पष्ट दिखाई देती है। इन पोस्ट्स के साथ वे प्रशासन और स्वास्थ्य मंत्रालय को टैग करके सीधा सवाल पूछते हैं।

 प्रशासनिक दबाव: वे लगातार जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को ज्ञापन सौंपते हैं और अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ लिखित शिकायतें दर्ज कराते हैं। उनकी मांग होती है कि समस्याओं का त्वरित निवारण किया जाए और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।

धरना-प्रदर्शन और जनआंदोलन: सिंगाड़ अक्सर अपने समर्थकों और प्रभावित मरीजों के परिजनों के साथ अस्पताल परिसर या कलेक्ट्रेट के सामने शांतिपूर्ण धरने-प्रदर्शन का आयोजन करते हैं। यह उनकी रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा है, जिससे मीडिया और आम जनता का ध्यान इस मुद्दे पर केंद्रित होता है।

मीडिया को बुलावा: वे स्थानीय और प्रादेशिक मीडिया को अस्पताल की स्थिति की रिपोर्टिंग के लिए आमंत्रित करते हैं, ताकि यह मुद्दा व्यापक स्तर पर उठे और सरकार दबाव में कार्यवाई करे।

प्रतिक्रिया और चुनौतियाँ

कमलेश सिंगाड़ के इस अभियान ने प्रशासन को हरकत में लाने का काम किया है। कई बार उनकी शिकायतों के आधार पर अस्पताल प्रबंधन ने तत्काल सफाई अभियान चलाया है या दवाइयों की आपूर्ति सुनिश्चित करने का वादा किया है। हालाँकि, यह समस्या अभी भी बनी हुई है और अक्सर यह सुधार अस्थायी साबित होते हैं।

दूसरी ओर, सिंगाड़ पर यह आरोप भी लगते हैं कि वे एक राजनीतिक दल के नेता होने के नाते इस मुद्दे का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कर रहे हैं। प्रशासन और विरोधी दल उनके तरीकों को विवादास्पद और जनता को भड़काऊ बता सकते हैं।

निष्कर्ष: एक आवाज़ जो गूंज रही है

निस्संदेह, कमलेश सिंगाड़ का अभियान झाबुआ जिला अस्पताल की सड़ी-गली व्यवस्था के खिलाफ एक जरूरी और साहसिक पहल है। उन्होंने एक ऐसे मुद्दे को केंद्र में लाया है जो सीधे तौर पर आम आदमी, खासकर समाज के सबसे गरीब और वंचित तबके के जीवन से जुड़ा है। भले ही उनके इरादों पर सवाल उठाए जा रहे हों, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनकी आवाज ने प्रशासनिक तंत्र में एक हलचल पैदा की है और स्थानीय जनता में एक नई उम्मीद जगाई है।

यह संघर्ष सिर्फ झाबुआ तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के सैकड़ों छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों में व्याप्त उसी अव्यवस्था का प्रतीक है, जहाँ गरीब का स्वास्थ्य और सम्मान दोनों दांव पर लगे होते हैं। कमलेश सिंगाड़ का अभियान इस बात का सबक है कि जब जनता का नेतृत्व सही मुद्दों पर आवाज उठाता है, तो व्यवस्था को बदलने का दबाव बनता है। अब यह देखना होगा कि क्या यह दबाव ठोस और स्थायी सुधारों का रास्ता खोल पाता है, या फिर यह आवाज भी व्यवस्था की दीवार से टकराकर बिखर जाती है।

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