1. पर्व का समय और महत्व (Time and Importance):
* समय: यह पर्व सामान्यतः दीपावली के अगले दिन या दूसरे दिन (यानी गोवर्धन पूजा/नव वर्ष के दिन) मनाया जाता है।
* उद्देश्य: यह मुख्य रूप से गौवंश (गाय और बैल) के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने, उनकी पूजा करने और पशुधन की रक्षा के लिए देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने का त्योहार है। यह आदिवासी संस्कृति, एकता और परंपरा का प्रतीक है।
2. पर्व की तैयारी और सजावट (Preparation and Decoration):
* सजावट: त्यौहार के एक दिन पहले से ही गायों और बैलों को अच्छे से नहलाया जाता है।
* रंग और मेंहदी: पशुओं के शरीर पर विभिन्न रंगों और मेंहदी (हेन्ना) से सुंदर चित्र और डिज़ाइन बनाए जाते हैं। कहा जाता है कि मेंहदी का रंग एक दिन पहले लगाने से गौहरी के दिन निखर कर आता है।
* आभूषण: गौवंश को मोर पंख, रंगीन वस्त्र, मालाएँ (जैसे धान के पौधे की माला), और घंटियाँ आदि से सजाया जाता है।
* गीत: दीपावली के लगभग 8 दिन पहले से ही ग्रामीण क्षेत्रों में 'हिडी' गीत गाने की परंपरा शुरू हो जाती है, जो गाय गोहरी के दिन भी सुबह गाया जाता है।
3. पूजा विधि और अनुष्ठान (Puja Rituals):
* गौ-पूजन: ग्रामीण अपने घरों के आंगन में या सार्वजनिक स्थान पर गौमाता के पैर धोते हैं, आरती उतारते हैं और दीपक जलाते हैं। गौमाता को लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है।
* गौशाला के देवता की पूजा: कुछ क्षेत्रों में गोड़ा बोंगा (गोशाला के देवता) की भी पूजा की जाती है, जिनका वास गोहाल (गोशाला) में माना जाता है।
* पूर्वजों का स्मरण: इस अवसर पर पूर्वजों को भी याद किया जाता है और उनसे परिवार की कुशलता, सुख-समृद्धि और पशुधन की रक्षा के लिए आशीर्वाद मांगा जाता है।
* गौरिया देव की आराधना: कुछ क्षेत्रों में, रात भर 'गौरिया देव' (एक स्थानीय देवता) की आराधना और भजन गाए जाते हैं। इसमें देव को जगाने के लिए पारंपरिक आदिवासी लोकगीत गाए जाते हैं।
* देव आह्वान: इस विधि में पारंपरिक आदिवासी लोग पानी में जाकर दूध और चावल को बेलपत्र के पान पर चढ़ाकर, सर के पग (पगड़ी) को उतारकर खुद को पवित्र करते हैं।
* देव प्रवेश: माना जाता है कि प्रसन्न होने पर गौरिया देव गांव के बड़वा (पुजारी) के शरीर में प्रवेश करते हैं।
4. मन्नत उतारने की अनूठी परंपरा (Unique Ritual of Fulfilling Vows):
* मुख्य आकर्षण: इस पर्व का सबसे अनोखा और साहसिक हिस्सा 'मन्नत उतारने' की परंपरा है, जो मुख्य रूप से झाबुआ और दाहोद जैसे क्षेत्रों में देखने को मिलती है।
* मन्नतधारी: जिन लोगों की मन्नतें पूरी हो जाती हैं (जैसे संतान प्राप्ति, व्यापार में सफलता आदि), वे मन्नतधारी गाय गोहरी के दिन सार्वजनिक मैदान या मंदिर के पास की जगह पर पेट के बल ज़मीन पर लेट जाते हैं।
* गोवंश का गुजरना: पूरी तरह से सजी हुई गायों और बैलों का झुंड (सैकड़ों की संख्या में) ग्वालों के मार्गदर्शन में इन मन्नतधारियों के ऊपर से गुज़रता है।
* आस्था: स्थानीय लोगों का दावा है कि इस दौरान किसी को कोई चोट नहीं आती, जो उनकी आस्था की अद्भुतता को दर्शाता है। वे इसे देवी-देवताओं का आशीर्वाद मानते हैं।
* परिक्रमा: कई स्थानों पर, गोवंश के झुंड को मंदिर (जैसे गोवर्धन मंदिर) की सात बार परिक्रमा भी करवाई जाती है और मन्नतधारी उसके नीचे लेटकर अपनी मन्नतें उतारते हैं।
5. सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व (Cultural and Social Significance):
* एकता: गाय गोहरी पर्व आदिवासी समाज में सामाजिक एकता और भाईचारे को बढ़ावा देता है, जहाँ लोग दूर-दूर से इकट्ठा होते हैं।
* पारंपरिक वेशभूषा: इस दिन आदिवासी पुरुष और महिलाएं अपनी पारंपरिक पोशाक पहनकर एकत्रित होते हैं और लोक नृत्य करते हैं।
* मनोरंजन: गौवंशियों के साथ आदिवासी खेलते भी हैं, जिससे यह उत्सव और भी मनमोहक बन जाता है।
* कृषि का आधार: आदिवासियों के जीवन का मुख्य आधार कृषि है, और गौवंश कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए, यह पर्व जीवन के आधार (पशुधन) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है।
यह पर्व आदिवासी समुदाय की गहरी आस्था, प्रकृति और पशुधन के साथ उनके अटूट रिश्ते और उनकी जीवंत संस्कृति को प्रदर्शित करता है
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