भारतीय ट्रेन का नजारा सरकार की लापर वाही यह ट्रेन में यात्रीयो के सफर आप यात्रियों का बहुत कठिन सफर जहाँ बहुत भीड़ है
भारतीय ट्रेन का नजारा सरकार की लापर वाही यह ट्रेन में यात्रीयो के सफर आप यात्रियों का बहुत कठिन सफर जहाँ बहुत भीड़ है
भारतीय ट्रेन की भीड़भाड़ वाली ट्रेन में यात्री का सफर
सुबह का समय था। स्टेशन पर यात्रियों की भारी भीड़ लगी हुई थी। ट्रेन जैसे ही प्लेटफॉर्म पर आई, लोगों में चढ़ने की होड़ मच गई। उसी भीड़ में एक यात्री भी था — एक आम इंसान, अपने गंतव्य की ओर बढ़ता हुआ।
उसके हाथ में एक बैग था, चेहरे पर थकान और आंखों में उम्मीद। बड़ी मुश्किल से वह ट्रेन के दरवाज़े तक पहुँचा। भीतर खड़े रहने की भी जगह नहीं थी। लोगों की आवाजें, धक्का-मुक्की, पसीने की गंध और बच्चों की रोने की आवाज — सब मिलकर सफर को और चुनौतीपूर्ण बना रहे थे।
खिड़की तक पहुँच पाना तो दूर, खड़े होने की जगह मिलना ही जैसे सौभाग्य था। लेकिन उस यात्री ने हार नहीं मानी। उसने हैंडल पकड़कर खुद को संभाला और मन ही मन सोचा — “यह तकलीफ़ थोड़ी देर की है, मंज़िल दूर नहीं।”
हर स्टेशन पर भीड़ और बढ़ जाती। ट्रेन में सवार हर यात्री की अपनी कहानी थी। किसी को नौकरी के लिए जाना था, किसी को घर लौटना था, तो किसी को इलाज के लिए शहर जाना था।
उस भीड़भरी यात्रा में भी वह यात्री शांति से खड़ा रहा। कभी किसी बुज़ुर्ग को सीट दिलवाई, कभी किसी बच्चे को गोद में उठाया। सफर कठिन जरूर था, पर उस यात्री का धैर्य और सकारात्मक सोच उसे मजबूत बनाए हुए थी।
जब गंतव्य आया, तो उसने राहत की सांस ली। यह सफर केवल भीड़ का नहीं था, यह सफर था संघर्ष, सहनशीलता और उम्मीदों का।
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