11 अक्टूबर रात को 1:00 से अलार्म बुलडोजर सीहोर मध्य प्रदेश भाजपा सरकार की तानाशाही

सीहोर का कोसमी: जब 65 साल पुराने घरों पर चला बुलडोजर, तो भाजपा सरकार के दामन पर लगा आदिवासी विरोध का दाग

सीहोर/भोपाल: मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर आदिवासी विरोध और सत्ता की साख का टकराव सड़कों पर उतर आया है। सीहोर जिले की बुधनी विधानसभा के कोसमी गांव में वन विभाग और प्रशासन ने रविवार दोपहर बरेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के घरों पर बुलडोजर चला दिया। आरोप है कि सिर्फ घर ही नहीं तोड़े गए, बल्कि खेतों में खड़ी मक्का और तुअर की फसलें रौंद दी गईं और सिंचाई व पेयजल के लिए इस्तेमाल होने वाले कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। प्रभावित परिवारों का दावा है कि उनके पास जमीन के पक्के कागजात हैं और वे पिछले 65 सालों से अधिक समय से इसी जमीन पर रह रहे हैं। फिर भी, भाजपा सरकार के आदेश पर अवैध कब्जा बताकर उन्हें बेघर कर दिया गया।
घटना का विवरण
जानकारी के मुताबिक, वन विकास निगम ने सरदार वल्लभभाई पटेल अभ्यारण्य की चिन्हित जमीन पर कथित अतिक्रमण हटाने के नाम पर यह कार्रवाई की। स्थानीय लोगों का कहना है कि रात करीब 1 बजे अंधेरे का फायदा उठाकर बुलडोजर चलाए गए, जिससे परिवार सदमे में आ गए। बच्चे, महिलाएं और पुरुष सभी बेघर होकर रोते-बिलखते रहे। प्रभावितों का दावा है कि उनके मकान पक्के थे और जमीन उनके नाम पर दर्ज है, जिसके पक्के कागजात उनके पास मौजूद हैं।

शिवराज सिंह चौहान की आपत्ति
घटना की जानकारी मिलते ही केंद्रीय कृषि मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कोसमी गांव पहुंचे। उन्होंने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और इस कार्रवाई को 'बर्बर' और 'जुल्म की पराकाष्ठा' करार दिया। उन्होंने कहा, "मेरे क्षेत्र में जुल्म की पराकाष्ठा हुई है। जो घर सुबह तक आबाद थे, वहां बच्चों की चीखें गूंज रही हैं।" शिवराज ने मौके से ही मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल को फोन कर पूरे मामले पर नाराजगी जताई और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।

भाजपा सरकार पर सवाल
शिवराज सिंह चौहान ने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री मोहन यादव की छवि खराब करने के लिए यह साजिश रची है। उन्होंने कहा, "जिन लोगों ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बीजेपी को वोट दिया, उन्हीं के घरों को क्यों तोड़ा गया? हमें इन लोगों के वोट से जीत मिलती है और उन्हीं के वोट से मोहन यादव मुख्यमंत्री बने हैं। यह मेरे लिए बहुत दुख की बात है।" उन्होंने कहा कि वह मुख्यमंत्री मोहन यादव से चर्चा कर पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने का प्रयास करेंगे।

विपक्ष का हमला
कांग्रेस ने इस मामले को भाजपा सरकार के आंतरिक कलह का नतीजा बताया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार के भीतर चल रही खींचतान की कीमत आदिवासी परिवार चुका रहे हैं। उन्होंने कहा, "जब खुद पूर्व मुख्यमंत्री सवाल उठा रहे हैं, तो मुख्यमंत्री को भी स्पष्ट करना चाहिए कि सरकार कब ठोस कदम उठाएगी। क्या सरकार के भीतर की सियासी जंग जनहित के सवालों पर भारी पड़ रही है?"

सरकार का पक्ष
वन विभाग का कहना है कि यह कार्रवाई वन भूमि पर किए गए कथित अवैध कब्जे हटाने के लिए की गई थी। विभाग के मुताबिक, 2021 में यहां प्लांटेशन किया गया था, जिसे आदिवासी परिवारों ने नष्ट कर खेती शुरू कर दी और झोपड़ियां बना लीं। हालांकि, प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे दशकों से इस जमीन पर रह रहे हैं और उनके पास इसके पक्के दस्तावेज हैं। उनका आरोप है कि सरकार जानबूझकर उन्हें बेदखल कर रही है।

राहत और पुनर्वास का आश्वासन
शिवराज सिंह चौहान ने प्रभावित परिवारों को आश्वासन दिया कि जिनके घर तोड़े गए हैं, उनके लिए नए घर बनवाए जाएंगे और तब तक उनके रहने व खाने की अस्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। हालांकि, सवाल यह है कि जब परिवारों के पास जमीन के पक्के कागजात हैं और वे 65 सालों से अधिक समय से वहां रह रहे हैं, तो उन्हें अवैध कब्जेदार कैसे मान लिया गया?

निष्कर्ष
कोसमी गांव की यह घटना मध्य प्रदेश की सत्ता और प्रशासन के भीतर गहरे अंतर्विरोधों को उजागर करती है। जहां एक ओर केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री अपने ही क्षेत्र में हुई इस कार्रवाई पर आक्रोश जता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर किन परिस्थितियों में रात के अंधेरे में इतनी बड़ी कार्रवाई की गई। भाजपा सरकार पर आरोप है कि उसने आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का हनन किया है और उन्हें उनकी जमीन से बेदखल कर दिया है। इस मामले ने राज्य सरकार और पार्टी संगठन के भीतर तनाव बढ़ा दिया है और आने वाले दिनों में इसके राजनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

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