मध्यप्रदेश के थांदला क्षेत्र के अंतर्गत स्थित ऐतिहासिक शिवगढ़ में इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व अत्यंत श्रद्धा
शिवगढ़ थांदला में महाशिवरात्रि का भव्य आयोजन, राजा के महल में गूंजे ढोल-मांदल और आदिवासी संस्कृति के रंग
मध्यप्रदेश के थांदला क्षेत्र के अंतर्गत स्थित ऐतिहासिक शिवगढ़ में इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। प्राचीन काल के राजा का महल, जिसे स्थानीय लोग शिवगढ़ महल के नाम से जानते हैं, पूरे दिन और रात धार्मिक आस्था तथा सांस्कृतिक उल्लास से सराबोर रहा। दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचे और भगवान शिव की आराधना के साथ मेले का आनंद लिया।
इस अवसर पर पूरा शिवगढ़ क्षेत्र धार्मिक नगरी में बदल गया। महल परिसर को आकर्षक सजावट, रंगीन रोशनी और पारंपरिक झंडों से सजाया गया था। जैसे ही शाम हुई, मंदिर परिसर में दीपों की रोशनी और भक्तों के “हर-हर महादेव” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठा।
राजा के महल में बना आस्था का केंद्र
शिवगढ़ में स्थित प्राचीन शिवगढ़ महल इस पर्व का मुख्य आकर्षण रहा। मान्यता है कि यह महल पुराने समय के एक स्थानीय राजा द्वारा बनवाया गया था और यहां वर्षों से महाशिवरात्रि का मेला आयोजित होता आ रहा है। महल के भीतर स्थापित भगवान शिव के मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं।
भक्तों ने जल, दूध, बेलपत्र और धतूरा अर्पित कर भगवान शिव का अभिषेक किया। रातभर भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान चलते रहे। स्थानीय पुजारियों ने विशेष पूजा एवं रुद्राभिषेक कराया, जिसमें आसपास के गांवों से आए लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
आदिवासी परंपराओं ने बढ़ाई मेले की रौनक
महाशिवरात्रि के इस आयोजन की सबसे खास बात रही आदिवासी संस्कृति की झलक। झाबुआ जिले के विभिन्न गांवों से आए आदिवासी समुदाय के लोगों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में ढोल और मांदल की थाप पर नृत्य प्रस्तुत किया। युवक-युवतियों की टोली गोल घेरा बनाकर पारंपरिक नृत्य करती नजर आई, जिसने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया।
ढोल-मांदल की गूंज दूर तक सुनाई देती रही। बुजुर्गों ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और महाशिवरात्रि का पर्व उनके लिए केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। कई परिवार अपने बच्चों को विशेष रूप से इस मेले में लाते हैं ताकि वे अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ सकें।
ग्रामीण मेले में उमड़ी भारी भीड़
मेले में स्थानीय व्यापारियों ने मिठाई, खिलौने, पारंपरिक आभूषण और ग्रामीण उपयोग की वस्तुओं की दुकानें लगाईं। बच्चों के लिए झूले और मनोरंजन के साधन आकर्षण का केंद्र बने रहे। महिलाओं ने पारंपरिक गीत गाते हुए पर्व की खुशियां साझा कीं।
ग्रामीणों का कहना है कि यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक मिलन का अवसर भी होता है, जहां रिश्तेदार और परिचित वर्षों बाद मिलते हैं। कई लोग रातभर जागरण में शामिल रहे और भोर तक मंदिर परिसर में भक्तों की आवाजाही जारी रही।
प्रशासन और ग्रामीणों का सहयोग
स्थानीय प्रशासन और ग्राम समिति द्वारा सुरक्षा तथा व्यवस्था के विशेष इंतजाम किए गए थे। स्वयंसेवकों ने श्रद्धालुओं को दर्शन कराने और भीड़ नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साफ-सफाई और पेयजल की व्यवस्था भी की गई, जिससे दूर से आए लोगों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हुई।
आस्था और संस्कृति का संगम बना शिवगढ़
महाशिवरात्रि के अवसर पर शिवगढ़ में देखने को मिला कि कैसे धार्मिक आस्था और आदिवासी संस्कृति एक साथ मिलकर अनोखा वातावरण तैयार करती है। राजा के ऐतिहासिक महल में आयोजित यह पर्व लोगों के लिए श्रद्धा, परंपरा और सामूहिक उत्सव का प्रतीक बन गया।
रात के अंतिम पहर जब आरती हुई, तब पूरा परिसर दीपों की रोशनी और जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने भगवान शिव से सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर साबित किया कि शिवगढ़ की महाशिवरात्रि केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा है, जिसे लोग पूरे उत्साह और गर्व के साथ हर वर्ष जीवित रखते हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें